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9.1.2 कक्षा- नवमी, विषय:- संस्कृतम् पाठ - 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् Class- 9th, Subject - Sanskrit, Lesson-1 Satyam Shivam Sundaram Sanskritam NCERT Book - शारदा / Sharda

 9.1.1 कक्षा- नवमी,  विषय:- संस्कृतम्

पाठ - 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्

     Class- 9th,  Subject - Sanskrit,  

Lesson-1 Satyam Shivam Sundaram Sanskritam 

           NCERT Book -  शारदा / Sharda             

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प्रथमः पाठः   सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्

(संस्कृत सत्य, कल्याणकारी, सुन्दर है)

पाठ का सार

संस्कृत भारत देश की सम्पदा है। इसमें भारतीय लोगों का ज्ञानवैभव संचित है। संस्कृत के अध्ययन से मनुष्य सुसंस्कृत होता है। भारतीय भाषाओं के सुचारू रूप से अध्ययन के लिए संस्कृत नितांत अपेक्षित है। संस्कृत के अध्ययन से क्या-क्या सिद्ध होता है - इस विषय को लेकर सुन्दर गीत कवि ने प्रस्तुत किया है।


मूलपाठः, शब्दार्थाः, सरलार्थाः, अन्वयाः, भावार्थाः, अभ्यासकार्यं च


1. भारती-यैकता-साधकं संस्कृतम्

   भारतीयत्व-सम्पादकं संस्कृतम्

   ज्ञान-पुञ्ज-प्रभा-दर्शकं संस्कृतम्

   सर्वदा-नन्द-सन्दोह संस्कृतम्॥१॥ 

शब्दार्थाः - साधकम् - सिद्ध करने वाली। सम्पादकम् - सम्पादन करने वाली। पुञ्ज - समूह। प्रभा - आलोक। दर्शकम् - दिखाने वाली। सन्दोह - समूह। दम् - देने वाली।

अन्वयः - संस्कृतं भारतीयैकता-साधकम् (अस्ति)। संस्कृतं भारतीयत्व-सम्पादकम् (अस्ति)। संस्कृतं ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वदानन्दसन्दोहदम् (अस्ति)।

सरलार्थः - संस्कृत भारतीय लोगों की एकता को सिद्ध करने वाली है। संस्कृत भारतीयता की सम्पादक है। संस्कृत ज्ञानपुञ्ज के आलोक को दिखलाने वाली है। संस्कृत सदा आनन्द के समूह को देने वाली है। 

भावार्थः - संस्कृत हमारे लिए सभी प्रकार से कल्याणकारिणी है।


2. सर्वमस्तिष्क-संस्कारकं संस्कृतम्

   सर्ववाणी-परिष्कारकं संस्कृतम्

   सत्पथ-प्रेरणा-दायकं संस्कृतम्

   सद्गुण-ग्राम-सन्धायकं संस्कृतम्॥२॥ 

शब्दार्थाः - मस्तिष्क - बुद्धि। संस्कारकम् - संस्कार करने वाली। परिष्कारकम् - शुद्ध करने वाली। सत्पथ - सन्मार्ग। ग्राम - समूह। सन्धायकम् - सन्धान करने वाली।

अन्वयः - 'संस्कृतं सर्वमस्तिष्कसंस्कारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्ववाणी-परिष्कारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सत्पथप्रेरणादायकम् (अस्ति)। संस्कृतं सद्गुणग्राम सन्धायकम् (अस्ति)।

सरलार्थः - संस्कृत सभी की बुद्धियों को संस्कारवान बनाने वाली है। संस्कृत सभी की वाणियों को शुद्ध करने वाली है। संस्कृत सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाली है। संस्कृत सद्गुणों के समूह का मेल कराने वाली है। 

भावार्थः - संस्कृत अनेक गुणों की खान है।


3. विश्व-बन्धुत्व-विस्तारकं संस्कृतम्

   सर्वभू-तैकता-कारकं संस्कृतम्

   सर्वतः शान्ति-संस्थापकं संस्कृतम्

   पञ्च-शील-प्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥३॥ 

शब्दार्थाः - विश्व - संसार। बन्धुत्व - भाईचारा। विस्तारकम् - विस्तार करने वाली। सर्वतः - सभी ओर से। संस्थापकम् - स्थित करने वाली। प्रतिष्ठापकम् - प्रतिष्ठित करने वाली। भूत - प्राणी।

अन्वयः - संस्कृतं विश्वबन्धुत्व विस्तारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वभूतैकताकारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वतः शान्ति संस्थापकम् (अस्ति)। संस्कृतं पञ्चशील-प्रतिष्ठापकम् (अस्ति)।

सरलार्थः - संस्कृत संसार के भाईचारा का विस्तार करने वाली है। संस्कृत सभी प्राणियों की एकता करने वाली है। संस्कृत सभी ओर से शान्ति की स्थापना करने वाली है। संस्कृत पञ्चशील (सिद्धान्त) को प्रतिष्ठित करने वाली (भाषा) है।

भावार्थः - संस्कृत विश्व की कल्याण करने वाली भाषा है।


4. त्याग-सन्तोष-सेवाव्रतं संस्कृतम्

विश्व-कल्याण-निष्ठायुतं संस्कृतम्

ज्ञान-विज्ञान-सम्मेलनं संस्कृतम्

भुक्ति-मुक्ति-द्वयो-द्वेलनं संस्कृतम् ॥४॥ 

शब्दार्थाः – युतम् – युक्त। भुक्ति – भोग। मुक्ति – मोक्ष। उद्वेलनम् – उत्थान करने वाली। द्वय – दोनों।

अन्वयः – संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवाव्रतम् (अस्ति)। संस्कृतं विश्वकल्याणनिष्ठायुतम् (अस्ति)। संस्कृतं ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् (अस्ति)। संस्कृतं भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनम् (अस्ति)।

सरलार्थः – संस्कृत त्याग, सन्तोष और सेवा के व्रत वाली है। संस्कृत विश्व के कल्याण की निष्ठा से युक्त है। संस्कृत ज्ञान व विज्ञान का सम्मेलन है। संस्कृत भोग व मोक्ष दोनों का उत्थान करने वाली है। 

भावार्थः – संस्कृत भोग व मोक्ष को देने वाली है।

5. धर्म-कामार्थ-मोक्षप्रदं संस्कृतम्

ऐहिका-मुष्मिको-त्कर्षदं संस्कृतम्

कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्

सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् ॥५॥

शब्दार्थाः – प्रदम् – प्रदान करने वाली। ऐहिक – इस लोक का। आमुष्मिक – परलोक का। उत्कर्षदम् – उत्कर्ष देने वाली। कर्मदम् – कर्म को देने वाली। सत्यनिष्ठ – सत्य निष्ठा वाली। शिवम् – कल्याणकारिणी। ज्ञानदम् – ज्ञान देने वाली।

अन्वयः – संस्कृतं धर्मार्थकाममोक्षप्रदम् (अस्ति)। संस्कृतम् ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं (अस्ति)। संस्कृतं कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं (अस्ति)। संस्कृतं सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरम् (अस्ति)।

सरलार्थः – संस्कृत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाली है। संस्कृत इस लोक और परलोक का उत्थान करने वाली है। संस्कृत कर्म को देने वाली, ज्ञान को देने वाली और भक्ति को देने वाली है। संस्कृत सत्यनिष्ठा वाली, कल्याणकारिणी तथा सुन्दर है। 

भावार्थः – संस्कृत मनुष्य का इस लोक तथा परलोक दोनों में कल्याण करने वाली भाषा है।

6. शब्द-लालित्य-लीलावनं संस्कृतम्

चारु-माधुर्य-धारागृहं संस्कृतम्

विश्व-चेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्

पूर्वजानां यशःस्मारकं संस्कृतम् ॥६॥ 

शब्दार्थाः – चारु – सुन्दर। माधुर्य – मधुरता। गृहम् – घर। चमत्कारकम् – चमत्कार करने वाली। चेतः – मन। स्मारकम् – स्मरण कराने वाली।

अन्वयः – संस्कृतं शब्दलालित्यलीलावनम् (अस्ति)। संस्कृतं चारुमाधुर्यधारागृहम् (अस्ति)। संस्कृतं विश्वचेतश्चमत्कारकं (अस्ति)। संस्कृतं पूर्वजानां यशःस्मारकम् (अस्ति)।

सरलार्थः – संस्कृत शब्दों के लालित्य की लीला का वन है। संस्कृत सुन्दर व मधुरता का आनन्ददायक गृह है। संस्कृत संसार के मानस को चमत्कृत करने वाली है। संस्कृत पूर्वजों की यशोराशि को स्मरण कराने वाली है। 

भावार्थः – संस्कृत सभी प्रकार से एक सुन्दर भाषा है।






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