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9.5.2 कक्षा- नवमी, विषय:- संस्कृतम् पाठ- 5 दानवीर: कर्ण: Class- 9th, Subject - Sanskrit, Lesson- 5 DanVeerH KarnH NCERT Book - इरावती / IRAVATI

 9.5.2 कक्षा- नवमी,  विषय:- संस्कृतम्

पाठ- 5 दानवीर: कर्ण:

     Class- 9th,  Subject - Sanskrit,  

Lesson- 5 DanVeerH KarnH 

           NCERT Book -  इरावती / IRAVATI            

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वयम् अभ्यासं कुर्मः 


1. एकपदेन उत्तरत- 
क. ब्राह्मणवेषधारी कः प्रविशति?
उ० शक्रः।
ख. शक्रः कं भिक्षां याचते?
 कर्णम्।
ग. कर्णः प्रथमं किं दातुम् इच्छति?
 सालङ्कारं गोसहस्रम्। 
घ. कालपर्ययात् का क्षयं गच्छति?
 शिक्षा।
ङ. कः कर्णं वारयति?
 शल्यः।

२. उचित पर्यायं मेलयत- 
    क                ख
१. वृक्षाः              ख. पादपाः
२. शक्रः              ङ. इन्द्रः
३. स्वर्णम्            ग. कनकम्
४. वाजिनः          क. अश्वाः
५. अङ्गराजः         घ. कर्णः

उत्तरक्रम:
१–ख, २–ङ, ३–ग, ४–क, ५–घ


३. प्रथमपुरुषस्य बहुवचने परिवर्तन- 
यथा — पिबति → पिबन्ति

क. करोति → कुर्वन्ति
ख. ददाति → ददति
ग. इच्छति → इच्छन्ति
घ. गच्छति → गच्छन्ति
ङ. हसति → हसन्ति 


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अस्मद् शब्द  (लिखें एवं स्मरण करें) 

              अस्मद् शब्द (ASMAD Shabd) 

                               सर्वनाम (मैं,  हम) 

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाअहम् आवाम्वयम्
द्वितीयामाम्आवाम्अस्मान्
तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभि:
चतुर्थीमह्यंआवाभ्याम्अस्मभ्य:
पंचमीमत्आवाभ्याम्अस्मभ्य:
षष्ठीममआवयो:अस्माकम्
सप्तमीमयिआवयो:अस्माषु

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श्लोक: (केवल पढ़ने के लिए) 

​शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्

सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः ।

जलं जलस्थानगतं च शुष्यति

हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥

शब्दार्थ:

  • शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात् – समय बीतने के साथ ग्रहण की गई शिक्षा (विद्या) भी नष्ट हो जाती है।
  • सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः – अत्यंत मजबूत जड़ों वाले वृक्ष भी समय आने पर गिर जाते हैं।
  • जलं जलस्थानगतं च शुष्यति – जलाशयों (सरोवरों/नदियों) में संचित जल भी सूख जाता है।
  • हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति – किंतु यज्ञ में दी गई आहुति (हवन) और सुपात्र को दिया गया दान सदा वैसा ही स्थिर (अमर) रहता है।

भावार्थ:

समय बीतने के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है—विद्या का प्रभाव क्षीण हो जाता है, गहरी जड़ों वाले विशाल पेड़ भी उखड़ कर गिर जाते हैं और जलाशयों का पानी भी सूख जाता है। संसार की समस्त भौतिक वस्तुएँ नश्वर हैं, केवल परोपकार के रूप में दिया गया दान और धर्म के निमित्त किया गया हवन/सत्कर्म ही हमेशा स्थायी रहता है और कभी नष्ट नहीं होता।  

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